जयशंकर पाठक
Friday, 27 April 2018
सुरभित यादें
फिर दोपट्टे की महक में घुल रहा हूँ मैं
फिर किसी ने नर्म अधरों से पुकारा है
चूड़ियों की खनखनाहट सुन रहा हूँ मैं
फिर किसी रात भर जग कर पुकारा है
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